साहित्य

संतुलन का संदेश

सुमन बिष्ट

धरती की हर धड़कन में,

जीवन का संगीत बसा,

प्रकृति के अनुपम आँगन में,

जब संतुलन का दीप जला॥

 

नदियाँ कल-कल गान सुनाएँ,

संसार को मर्यादा का पाठ पढ़ाएँ,

अंत में सागर की बाहों में जाकर,

अपना पूर्ण अस्तित्व उसमें समाएँ॥

 

ऊँचे पर्वत शीश उठाए,

धैर्य और दृढ़ता सिखलाएँ,

जड़ों से जुड़े रहकर ही,

वो ऊँचाइयों को छू पाएँ।

 

सूरज तपकर जग चमकाए,

चंदा शीतल छाया दे जाए,

एक उष्णता, एक शांति,

जीवन को समता दे जाए॥

 

मौसम का परिवर्तन देखो,

ये कैसा सुंदर विधान है,

सुख-दुख, हानि-लाभ सभी में,

छिपा संतुलन का ज्ञान है।

 

पवन कभी मृदु स्पर्श बने,

और कभी प्रचंड रूप धरे,

हर परिस्थिति में जीना ही,

जीवन का आधार बने॥

 

किन्तु मनुज अब भूल रहा है,

प्रकृति का पावन अनुबंध,

लोभ-मोह में बाँध रहा है,

अपने ही जीवन का हर छंद।

 

वन उजड़े, नदियाँ मैली,

आकाश हुआ है व्याकुल,

मूक प्राणियों की पीड़ा से,

रोता है वातावरण आकुल।

 

अब भी समय है जाग उठें हम,

धरती का हरित श्रृंगार करें,

जल, जंगल और जीवों का,

मिलकर सब सत्कार करें।

 

जब मानव और प्रकृति मिलकर,

प्रेम-संतुलन को अपनाएँगे,

तब फिर से इस धरा धाम पर,

स्वर्गिक फूल खिल जाएँगे॥

 

संतुलन ही सृष्टि का आधार,

संतुलन ही जीवन का मान,

इसके संरक्षण में ही छिपा है,

सम्पूर्ण मानवता का कल्याण॥

 

स्वरचित मौलिक अभिव्यक्ति

सुमन बिष्ट, नोएडा

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