
ओ हवा !
पैगाम ले जा,
मेरा उस वीर के पास।
भविष्य गढ़ने को हमारा,
अर्पित कर रहा जो आज।
प्राणपण से जूझता,
कंटकों चूमता,
धायल पड़े उस वीर को,
करना स्पर्श तू धीर से,
हर ताप लेना उसका सब,
संदेश देना उसे ये तब,
तेरे गाँव-घर से आई हूँ,
यादें मधुर मैं लाई हूँ।
तुझे चूम लेगा अधीर हो,
वह झूम लेगा पीर खो।
सुन ओ बादल घनेरे!
विगलित करूणा के चितेरे।
सबकी पीड़ा दूर करता,
नवजीवन धरती पर भरता,
जा तू उस वीर के पास,
रक्त- सरोवर में हो स्नात।
भरे आंँखों में सपने हजार,
दूर तक बस चीत्कार,
उस देश के दीवाने पर,
बरसाना रिम-झिम फुहार,
खिल उठेगा वीर वह,
आएगा फिर नव निखार,
जोश भर छाती में फिर से,
लेगा रिपु का सिर उतार।
सुन ओ बादल घनेरे!
चोटियों पर थिरक ,मचलती,
इंद्रधनुषी समां करती,
सुन ओ उजली किरण!
जो अंधेरे से घिरा है,
सभी संगी-साथी खोकर,
जीते जी ही जो मरा है।
हौंसला जिसका अदम्य,
पस्त होने को खड़ा है
जा तू उसके पास जा।
गोद में अपनी उसे ले,
अंधेरे सब दूर कर दे।
दे दे उसे उजले सवेरे,
तेरी उजली किरण पाकर,
हंस उठेगा सहज सुर में,
बढ़ेगा कर्तव्य पथ पर,
अरी ओ उजली किरण।
हवा,बादल,किरण तुम सब,
बस मेरा यह काम कर दो।
मेरे वीर लाड़ले सुत को,
पैगाम इस जननी का दे दो।
तुझसे ही तो धन्य,कृतज्ञ हो,
आज मुक्त मैं मुस्कराती हूँ।।
आंँचल में लेकर अपने मैं,
देश-भविष्य दुलराती हूँ।
तेरे बलिदानों से गर्वित,
वीर प्रसूता कहलाती हूँ।
अरे ओ बादल ,हवा,किरण!
कर दो बस ,इतना सा काम।
प्राण -प्रिय पुत्र को मेरे,
मुझ माँ का दे दो ,
यह पैगाम।
वीणा गुप्त
नई दिल्ली




