
हृदय से निकलता निस्वार्थ पावन भाव,
भर देता चुपके से गहरे घाव।
भौतिक वस्तुएं तो बस क्षणभंगुर माया,
दुआ बनती हमेशा शीतल सुखद साया।
संकट में बनती यह मरुस्थल पानी,
बदल देती अक़्सर सोई हुई तक़दीर।
शब्दों की सीमा से बहुत आगे बढ़कर,
रूह को छूती है दुआ बनकर।
अहंकार मिटाकर जब शीश झुक जाता,
तब मानव दुआ का मर्म समझ पाता।
दौलत से न तौलो इस अनमोल रत्न,
इसे पाने का करो सदा ही प्रयत्न।
यह वो ख़ुशबू है जो दिखती नहीं,
दुआ बाज़ारों में कभी बिकती नहीं।
निराश चेहरों पर लाती मधुर मुस्कान,
बना देती है हर मुश्किल काम आसान।
रिश्तों को देती एक नया जीवनदान,
पहचानती है हर आत्मा की उड़ान।
भेजें इसे हम बिना किसी स्वार्थ,
तभी सिद्ध होगा जीवन का परमार्थ।
-डो.दक्षा जोशी ‘निर्झरा ‘
अहमदाबाद,गुजरात।




