साहित्य

ग़ज़ल

पंडित मुल्क राज

अंधेरों के समंदर में जो नूर भरता है,

वो कोई और नहीं बस वो नूर तेरा है।

 

बरसती है जहां पर हर घड़ी रहमत तेरी,

करम का इस जमाने में वह साया तेरा है।

 

दुआएं लेकर आते हैं तेरे दरबार में,

की गुलशन के हर गुल पे करम तेरा है।

 

भटकते मुसाफिर को जो राह दिखाता है,

वही तो रहनुमा और पाक रास्ता तेरा है।

 

न भूलूं मैं कभी वह पल आए ना कभी,

कि तू ही मालिक मेरा आसरा भी तेरा है।

 

खुदाया हर एक शय पर बसेरा तेरा है,

यह जमीन भी तेरी है “आकाश” में तेरा है।

 

पंडित मुल्क राज “आकाश”

गाजियाबाद उत्तर प्रदेश

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