साहित्य

इतिहास के झरोखे से नाटककार हरिकृष्ण ‘प्रेमी’

विवेक रंजन श्रीवास्तव 

मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी प्रतिवर्ष नाट्य लेखन के लिए हरिकृष्ण प्रेमी नाट्य पुरस्कार के 51हजार रुपये के सम्मान प्रदान करती है।

मुझे गौरव है कि मुझे यह सम्मान वर्ष 2012 में मेरी नाट्यकृति हिंदोस्ता हमारा के लिए, तथा अब वर्ष 2024 में पुनः मेरे लंबे, 12 अंकों के नाटक जलनाद के लिए घोषित किया गया है।

 

हिंदी नाट्य साहित्य के फलक पर जब भी ऐतिहासिक गौरव, सांस्कृतिक चेतना और मानवीय संवेदनाओं के अनूठे संगम की बात होगी, नाटककार हरिकृष्ण ‘प्रेमी’ का नाम एक देदीप्यमान नक्षत्र की तरह चमकेगा। सन 1908 में मध्य प्रदेश के गुना की माटी में जन्मे प्रेमी जी का जीवन उस दौर में परवान चढ़ा जब देश पराधीनता की बेड़ियों को काटने के लिए छटपटा रहा था और राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन अपने पूरे उफान पर था। इस क्रांतिकारी परिवेश ने उनके भीतर देशप्रेम, समाज सुधार और मानवीय मूल्यों की ऐसी त्रिवेणी प्रवाहित की, जिसने आगे चलकर उनके लेखन की रीढ़ तैयार की। वे केवल रंगमंच के लिए शब्द रचने वाले रचनाकार नहीं थे, बल्कि इतिहास के पन्नों में दबी हुई राष्ट्रीय चेतना को अपनी लेखनी से जीवंत करने वाले एक कुशल नाट्य-शिल्पी थे।

प्रेमचंद के उस दौर में जहां कथा-साहित्य सामाजिक यथार्थ के ताने-बाने बुन रहा था, वहीं प्रेमी जी ने नाटक के मंच को वैचारिक क्रांति का माध्यम बनाया। उनके नाटकों की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि वे इतिहास को केवल राजा-रानियों के वैभव, युद्धों के कोलाहल या महलों की विलासिता के रूप में नहीं देखते थे। उन्होंने इतिहास के गलियारों से हमेशा उन प्रसंगों को चुनकर निकाला, जो उनके समकालीन समाज और आज के भारत के लिए भी एक मार्गदर्शक की भूमिका निभा सकें। जब देश विभाजन की विभीषिका और सांप्रदायिकता की कड़वाहट से जूझ रहा था, तब प्रेमी जी ने अपने नाटकों के माध्यम से हिंदू-मुस्लिम एकता और सांस्कृतिक सौहार्द का ऐसा मजबूत सेतु तैयार किया, जिसकी मिसाल आज भी दी जाती है। उनके पात्र कभी भी सीधे-सपाट नहीं होते थे, बल्कि वे मानवीय कमजोरियों, द्वंद्वों और अच्छाइयों से भरे हाड़-मांस के जीवंत इंसान लगते थे, जिनसे दर्शक सीधे जुड़ाव महसूस करते थे।

उनकी कालजयी कृतियों में सन 1934 में आया उनका नाटक ‘रक्षाबंधन’ आज भी हिंदी नाट्य साहित्य का एक मील का पत्थर माना जाता है। चित्तौड़ की रानी कर्मवती द्वारा हुमायूं को राखी भेजने और हुमायूं द्वारा ‘राखी की लाज’ निभाने की इस ऐतिहासिक घटना को प्रेमी जी ने जिस शिद्दत से मंच पर उतारा, उसने समाज को यह अमर संदेश दिया कि मानवता और स्नेह के धागे मजहब की किसी भी दीवार से कहीं ऊंचे और मजबूत होते हैं। इसी तरह उनके नाटक ‘शिवासाधना’ ने छत्रपति शिवाजी महाराज के स्वराज्य संघर्ष के माध्यम से पराधीन भारतीयों के भीतर सोया हुआ स्वाभिमान जगाने का काम किया। वहीं ‘स्वप्नभंग’ जैसे नाटकों में दारा शिकोह की उदारवादी सोच और उसके जीवन की त्रासदी को रेखांकित कर उन्होंने सत्ता के संघर्ष के बीच भी मानवीय रिश्तों की सुकोमल कड़ियों को बखूबी टटोला।

प्रेमी जी के नाटक केवल पुस्तकालयों की शोभा बढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि पूरी तरह रंगमंच की कसौटी पर कसे हुए थे। उनकी भाषा में एक गजब की रवानी और सहजता थी। वे संस्कृतनिष्ठ शब्दावली के मोह में पड़ने के बजाय आम बोलचाल की हिंदी और उर्दू के मुहावरों व खूबसूरत लफ्जों का ऐसा गुलदस्ता पेश करते थे कि संवाद सीधे दर्शकों के दिलों में पैठ बना लेते थे। छोटे-छोटे दृश्य, कसी हुई पटकथा और आदि से अंत तक बना रहने वाला कौतूहल उनके नाटकों को आज भी प्रासंगिक बनाए हुए है। आज के इस दौर में, जहां समाज में दूरियां और अविश्वास की दरारें चौड़ी हो रही हैं, हरिकृष्ण ‘प्रेमी’ का साहित्य हमें हमारी साझी संस्कृति, आपसी रवादारी और उस प्रेम की याद दिलाता है जो इस मुल्क की असली ताकत है। इतिहास को गवाह बनाकर वर्तमान की विसंगतियों को सुधारने की यह विलक्षण कला ही उन्हें हिंदी नाट्य जगत का एक शाश्वत और अमर हस्ताक्षर बनाती है।

 

विवेक रंजन श्रीवास्तव

 

(हरिकृष्ण प्रेमी नाट्य पुरस्कार से मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी से पुरस्कार प्राप्त)

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!