
सदा जो चहचहाता था, वही इतवार खलता है,
जुदा बच्चों से होकर घर का हर लम्हा बदलता है।
न पूड़ी-छोले की ज़िद है, न वो आवाज़ आँगन में,
सुलगती याद में उनकी, ये तन्हा दिल मचलता है।
कहाँ वो रूठना-मनाना, कहाँ वो बचपना सारा,
मकां सूना पड़ा है, दर्द आँखों से पिघलता है।
कभी जो रौनकें थीं, आज वो सन्नाटा डसता है,
बिना उस शोर के अब घर का दम ही जैसे घुटता है।
क्षितिज को देखती आँखें, दुआएँ भेजतीं पल-पल,
जिन्हें पाला था बाज़ुओं में, ख़याल अब उनका पलता है।
रहे वो शाद और आबाद, चूमे हर क़दम रौनक़,
सलामत और तरक़्क़ी की, दुआ में दिल पिघलता है।
पूर्णिमा सुमन
झारखंड धनबाद




