
कन्हैया कण कण में है व्याप्त।
एक बार जो कृपा कर दें आवागमन समाप्त ।
मनमोहन बस झलक दिखा दो ।
तान मधुर मुरली की सुना दो ।।
आओ आओ अच्युत मेरे , समय होय समाप्त।
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गज को ग्राह से आप बचाया।
अहो भाग्य मैं शरण में आया।।
राम कृष्ण हरि नाम जपे जा , बस यही है पर्याप्त।
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था अक्षयपात्र द्रोपदी खाली ।
तुम शाकपत्र उठाकर खाली ।।
उदर पूर्ति ऋषि मुनि सब हो गई पूरी भूख समाप्त।
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उत्तरा ने जब तुम्हें पुकारा।
पारीक्षत को आप उबारा।।
अन्तर्यामी जगत आपके यह रोम रोम में व्याप्त।।
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डा राजेश तिवारी मक्खन
झांसी उ प्र



