साहित्य

उसके माँ-बाप नहीं थे

दिनेश पाल सिंह

मैंने पूछा,

“बेटा! फिल्में देखते हो?”

वह मुस्कुराकर चुप रह गया।

 

मैंने पूछा,

“मोबाइल चलाते हो?”

वह फिर भी कुछ न बोला।

 

मैंने हँसकर कहा,

“जेब खर्च कहाँ उड़ाते हो?”

 

उसकी आँखें भर आईं…

 

धीरे से बोला,

“साहब… मेरे पापा नहीं हैं,

वे अब इस दुनिया में नहीं हैं..”

 

बस इतना सुनना था कि

मेरे सारे प्रश्न

मेरी ही नज़रों में छोटे पड़ गए।

 

मैंने देखा,

उसके बाल बिखरे हुए थे।

 

मैंने सहज ही पूछा,

“कंघी क्यों नहीं करते बेटा?”

 

उसने सिर झुका लिया..

फिर टूटी हुई आवाज़ में बोला,

“माँ भी पिछले साल चली गई…”

 

उस क्षण लगा,

धरती मेरे पैरों के नीचे से खिसक गई।

 

मैंने उसे सीने से लगा लिया,

लेकिन समझ नहीं पाया—

मैं उसे ढाढ़स बँधा रहा था,

या स्वयं टूट रहा था।

उस दिन जाना…

 

हर मुस्कुराता चेहरा

खुश नहीं होता।

 

हर फटे कपड़े वाला

गरीब नहीं होता।

और…

 

हर अनाथ बच्चा

भीख नहीं माँगता,

 

कुछ बच्चे तो बस

एक बार “बेटा”

कहकर पुकारे जाने की

उम्र भर प्रतीक्षा करते हैं।

 

यदि आपके घर में

माँ की ममता है,

पिता का साया है,

 

तो लौटकर आज ही

उन्हें गले लगा लेना..

 

क्योंकि इस संसार में

सबसे बड़ा निर्धन वह नहीं

जिसकी जेब खाली हो,

 

सबसे बड़ा निर्धन तो वह है,

जिसके सिर से

माँ का आँचल

और पिता का हाथ

दोनों उठ चुके हों।😭

 

*कवि दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’*

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!