
पिता दिवस पर सादर श्रद्धांजलि,
माता पिता को आज समर्पित हैं,
श्रद्धासुमन अर्पण सब परिवार के हैं,
आपके आशीष से सौभाग्य निर्मित हैं।
माँ का रुदन सुना सबने है,
पर पिता नहीं रो सकता है,
पिता स्वयं के नही रहें तो भी,
पुरुष स्वयं नहीं रो सकता है।
पत्नी हमेशा के लिये साथ छोड़
जाये फ़िर भी नहीं रो सकता है,
परिवार सम्हालने और पालने की,
सांत्वना देने की ज़िम्मेदारी जो है।
बाल श्रीकृष्ण को संकट में सिर पर,
वसुदेव ने उठा यमुना पार कराया था,
कौशल्या पुत्र राम के वियोग में ही
तो पिता दशरथ ने प्राण गँवाया था।
पिता की घिसी हुई चप्पलें देखकर,
उनका वात्सल्य समझ में आता है,
बनियाइन के छेद देख हमें हमारे,
हिस्से का भाग्य समझ में आता है।
संतान को कोई कमी नहीं होने पाये,
सेविंग क्रीम भूल नहाने के साबुन से,
दाढी बनाने वाले अपने पिताओं को,
हममें से बहुत से बच्चे देख सकते हैं।
बीमार पड़ें तो भी अस्पताल नहीं जाते,
डॉक्टर ने कुछ दिन आराम बताना है,
उतनी आय नही हो लेकिन बेटे-बेटी
को तो डाक्टर इंजीनियर बनाना है।
परीक्षा का परिणाम देख माँ तो
तारीफ़ और गुणगान भी करती है,
मिठाई लाने वाले पिता की भावना
अक्सर पर्दे के पीछे चली जाती है।
माँ बनने पर स्त्री की खातिरदारी की
जाती है आखिर उसने कष्ट उठाये हैं,
बेचैनी से भागदौड करने वाले पिता
को सभी नजरअंदाज ही कर देते हैं।
दुःख दर्द दिखाने की ख़ातिर मेरी माँ
शब्द ही हम सबके मुख में आते हैं,
लेकिन पास से बड़ी बस गुजर जाये
तो “बाप रे” शब्द मुँह में आ जाते हैं।
अपने माता पिता के साथ साथ ही
आदित्य हर माता पिता को अर्पित,
पिता दिवस की यह रचना सारे माता
पिताओं को है सादर आज समर्पित।
डा० कर्नल आदिशंकर मिश्र,
‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’
‘विद्यासागर’, लखनऊ




