साहित्य

मनुहार एकावली छंद

सरोज शर्मा

रूपसी ! सुनो ना ।

ख़फ़ा हो,कहो ना ।

कोप तो ,करो ना ।

संग  घर,चलो ना ।

 

रूप जो,  मिला है ।

फूल सा ,खिला है ।

प्यार का ,सिला है ।

अभी भी ,गिला है ।

 

रूठती  ,   मनालूं ।

गिरो तो , सँभालूं ।

अंक  में , उठा लूं ।

नयन में , बसा लूं ।

 

चाँदनी ,  रात में ।

घूमते ,  साथ   में ।

बात ही , बात में ।

हाथ लिया,हाथ में ।

 

सरोज शर्मा

दिल्ली

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