
रविवार 14 जून 26
” *हानि लाभ जीवन मरण*
*यश अपयश विधि हाथ”*
*गीतिका छंद*
*मापनी -2122-2122/2122-212*
*पदांत -212*
जन्म होता है यही तो, मृत्यु भी तो सत्य है।
लाभ क्या है हानि क्या है, जिंदगी तो पत्य है।।
चाहते सबकी बड़ी है, सोच छोटी है यहाँ।
घाट पर जाते सभी हैं, अंत पाये है जहाँ।।
कर्म मानव धर्म की है, मर्म की यह बात है।
शर्म छोडोगे यहीं तो, शुभ घड़ी की रात है।।
मृत्यु को जो देखता है, हो दुखी रोता सही।
मौन साधे सब खड़े हैं, अश्रु रोके हैं वहीं।।
हानि होगी लाभ होगा, ये नहीं सोचो यहाँ।
यश मिले अपयश मिलेगा, छोड़ जाते हैं जहाँ।।
मृत्यु सुख की नींद होती, कह रहा जगदीश है।
देवता भी देखते हैं, हँस रहे अवनीश हैं।।
डॉ जगदीश नारायण गुप्त
“जगदीश”
बनारस✍️✍️




