साहित्य

प्राप्ति

वीणागुप्त

आतुर मन-मृग ढूँढे पल- पल,

आकुल हो कस्तूरी रे।।

कठिन बहुत ही है तय करना,

खुद से खुद की दूरी रे।

 

कभी दौड़ता मंदिर -तीरथ

करे यज्ञ अरु जाप रे।।

राम-नाम की ओढ़ चदरिया

तिलक छाप, उपवास रे।।

मन मारे से नहीं मिले वह

आस नहीं हो पूरी रे।।

 

आतुर मन-मृग ढूँढे पल- पल,

आकुल हो कस्तूरी रे।।

कठिन बहुत ही है तय करना,

खुद से खुद की दूरी रे।

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बस साँसों का आना- जाना।

झीना- बीना जीवन  ताना।

लाद रहा क्यों गठरी भारी?

अगले पल का नहीं ठिकाना।

तृषित जगत को मुक्त लुटा दे,

रहे न प्यास अधूरी रे।।

 

आतुर मन-मृग ढूँढे पल- पल,

आकुल हो कस्तूरी रे।।

कठिन बहुत ही है तय करना,

खुद से खुद की दूरी रे।

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अग्नि जैसे  काठ समाई।

बूंद विलग नहीं सागर से।

कण-कण में है रूप उसी का

झाँक देख  निज अंतर में।।

मन -दर्पण को उजला कर ले

दीखे छवि सुनहरी रे।।

आतुर मन-मृग ढूँढे पल- पल,

आकुल हो कस्तूरी रे।।

कठिन बहुत ही है तय करना,

खुद से खुद की दूरी रे।

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पावन संतुष्टि- जल धारा।

मुक्ति इसका सुखद किनारा ।

दृढ़ संयम की नौका ले ले।

सहज भाव से इसको खे ले।

कर्म सभी कर इष्ट समर्पित ।

मिल  जाए कस्तूरी रे।।

आतुर मन-मृग ढूँढे पल- पल,

आकुल हो कस्तूरी रे।।

कठिन बहुत ही है तय करना,

खुद से खुद की दूरी रे।

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वीणागुप्त

नई दिल्ली

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