
आतुर मन-मृग ढूँढे पल- पल,
आकुल हो कस्तूरी रे।।
कठिन बहुत ही है तय करना,
खुद से खुद की दूरी रे।
कभी दौड़ता मंदिर -तीरथ
करे यज्ञ अरु जाप रे।।
राम-नाम की ओढ़ चदरिया
तिलक छाप, उपवास रे।।
मन मारे से नहीं मिले वह
आस नहीं हो पूरी रे।।
आतुर मन-मृग ढूँढे पल- पल,
आकुल हो कस्तूरी रे।।
कठिन बहुत ही है तय करना,
खुद से खुद की दूरी रे।
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बस साँसों का आना- जाना।
झीना- बीना जीवन ताना।
लाद रहा क्यों गठरी भारी?
अगले पल का नहीं ठिकाना।
तृषित जगत को मुक्त लुटा दे,
रहे न प्यास अधूरी रे।।
आतुर मन-मृग ढूँढे पल- पल,
आकुल हो कस्तूरी रे।।
कठिन बहुत ही है तय करना,
खुद से खुद की दूरी रे।
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अग्नि जैसे काठ समाई।
बूंद विलग नहीं सागर से।
कण-कण में है रूप उसी का
झाँक देख निज अंतर में।।
मन -दर्पण को उजला कर ले
दीखे छवि सुनहरी रे।।
आतुर मन-मृग ढूँढे पल- पल,
आकुल हो कस्तूरी रे।।
कठिन बहुत ही है तय करना,
खुद से खुद की दूरी रे।
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पावन संतुष्टि- जल धारा।
मुक्ति इसका सुखद किनारा ।
दृढ़ संयम की नौका ले ले।
सहज भाव से इसको खे ले।
कर्म सभी कर इष्ट समर्पित ।
मिल जाए कस्तूरी रे।।
आतुर मन-मृग ढूँढे पल- पल,
आकुल हो कस्तूरी रे।।
कठिन बहुत ही है तय करना,
खुद से खुद की दूरी रे।
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वीणागुप्त
नई दिल्ली




