
कागज कलम और दवात,
तीनों से मिलकर बनती बात।
दवात से भावनाएं निकलती,
कलम कागज पर उन्हें बिखेरती।
दवात कलम को स्याही देती,
कलम उसमें रंग है भरती।
कागज उनको आकार है देता,
भावनाओं का प्यार है भरता।
कोरा कागज लगता है प्यारा,
कलम ने मन का बोझ उतारा।
स्याही अक्षर को रंग है देती,
भावनाओं की नदियां बहती।
कागज कलम दवात की जोड़ी,
जिन्होंने सारी मुश्किलें हैं तोड़ी।
हर युग में ज्ञानदीप है जलाया,
ज्ञान खुशबू से जीवन महकाया।
सौ, भावना मोहन विधानी ✍️
अमरावती महाराष्ट्र।




