
है चाँद आया आज छत पै , पूछ घट बढ़ राज माँ।
छूना मुझे अब चाँद मामा , खेल का यह साज माँ।।
तू गोद से मुझको उछालो , व्योम पर छू लूँ उसे।
जिद ठान ली है लाल ने जो , भूमि पर लाना इसे।।
बिट्टू ! गया है चाँद माँ घर , मौज मस्ती घूमने।
ईमेल अब उसको किया है , लौट आ सुत चूमने।।
माँ! रातभर सोया नहीं मैं , दृष्टि चंदा ओर थी ।
थी रात्रि तारे गिन कटी माँ! , हो गयी नव भोर थी ।।
सीढ़ी लगा के छू उसे लूँ , संग उसके घूमना।
है आत्मबल विश्वास मुझ में , प्रश्न मुझको पूछना।।
जन चौथ चंदा ईद पूजें , तोड़ते व्रत सामने।
की पूर्ण इसरो ने वही जिद , चाँद को है जानने।।
डॉ मंजु गुप्ता
वाशी , नवीमुम्बई, महाराष्ट्र




