
छतरी की दृढ़ ओट,
बूँद के प्रहार रोके,
तन को तो बचाए,
पर मन को न बचा सके।
बाहर है घटा घोर,
नीर की झड़ी लगी,
अंदर ही अंदर,
आँखों से आंसू रोक न सके।
पलकों की छाँव में,
यादों की नमी पगी,
स्मृतियों के झोंके, दिल की ज़मीं पर छा गए।
साँसों की सरगम,
मौन में रुदन बनी,
छतरी के नीचे भी,
दिल भीग जाता है,
जब बरसात में, किसी का ख़्याल आ जाता है।
-डॉ. दक्षाजोशी’निर्झरा’
अहमदाबाद,गुजरात।




