
मां की गोद में सारा जहाँ समाया है,
उसकी हंसी में ही तो सवेरा आया है,
रातों को जागकर उसने हमें सुलाया है,
अपने आँसू छुपाकर हमें हंसाया है।
थकान में भी उसके हाथ दुआ देते हैं,
बिन कहे ही सारे दर्द वो ले लेते हैं,
रोटी खुद कम खाकर हमें खिलाती है ,
हमारी खुशी में ही उसकी खुशी छिपी जाती है।
मां की ममता का कोई मोल नहीं होता,
उसके आँचल सा कोई छांव नहीं होता,
गिरते हैं जब भी, वही थाम लेती है,
टूटे ख्वाबों को फिर से जाम लेती है।
उसकी आंखों में बस बच्चों का संसार है,
मां का दिल तो खुदा का ही अवतार है,
चाहे दूर रहें या पास, वो साथ निभाती है,
मां बस मां है, हर रूप में ममता लुटाती है।
मौलिक, स्वरचित
डॉ संजीदा खानम शाहीन




