
वता शब्द नहीं, एक एहसास है,
धर्म की दीवार से ऊँचा, जाति से परे,
वो हाथ जो बिना पूछे थाम ले,
आँख जो बिना कहे आँसू समझ ले।
रोटी का आखिरी टुकड़ा बाँट लेना,
प्यासे को अपना गिलास थमा देना,
गिरते हुए को भी सहारा देना है,
यही मानवता की असली इबादत है।
मंदिर-मस्जिद में ढूँढते हैं जिसे लोग,
वो तो भूखे के निवाले में बसती है,
किसी अनजान चेहरे की मुस्कान बनती है,
बेसहारा के आँगन का उजाला बनती है।
जहाँ नफरती आग लगे, वहाँ प्रेम का पानी बने,
जहाँ अँधेरा घिरे, वहाँ उम्मीद का दिया जलाए,
छोटा बनकर बड़े का मान रखना,
बड़ा बनकर छोटे को गले लगाना।
मानवता न बूढ़ी होती, न मिटती कभी,
बस कभी-कभी हम उसे भूल जाते हैं,
वरना धरती आज भी टिकी हुई है,
उन्हीं हाथों में जो इंसानियत नहीं भूले हैं।
तो आओ, इंसान होने का फर्ज निभाएँ,
“मैं” से पहले “हम” को जगह दें,
आदित्य मानव वही है जिसके दिल में,
मानवता की साँसे धड़कती हैं।
डॉ कर्नल आदिशंकर मिश्र
‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’
‘विद्यासागर’, लखनऊ
दिनांक: 16 जून 2026




