साहित्य

पिता

डॉ.उदयराज मिश्र

है अगर नाव तो पतवार पिता है।

लग जाये कहीं चोट तो उपचार पिता है।।

खा खा के पेट आधा जो पालता है घर-

अपनों के बीच सबका सरदार पिता है।।

 

सबके गुनाह ओढ़ वो झुकता है हर जगह-

रखता हिसाब सबका वो रखवार पिता है।

छाया में जिसकी रह अमीरी का बोध हो-

सन्तान की हर चाह का ऐतबार पिता है।।

 

करता है प्यार ऐसा कि शासन न भंग हो-

लाता है सबकी चीज भले जेब तंग हो।

मिलते हैं संस्कार सबको जिसकी डांट से-

दुनियां के अनुभवों का व्यवहार पिता है।।

 

लोग चल ही कहाँ पाते दुनियां की भीड़ में-

अंगुली पकड़ चलाये वो मददगार पिता है।

औलाद बनें नेक औ उससे भी तेज हों-

इतनी ही ख्वाहिशों का तलबगार पिता है।।

 

-डॉ.उदयराज मिश्र

9453433900

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