
मौसम की तरह बदल है जाते,
हमारे अपने रिश्तों के भी रंग।
कभी तो कारवां चलता साथ हमारे,
कभी कोई नहीं होता राह में संग।
कुछ रिश्ते होते हैं तपती धूप से,
भावनाओं को झूलसा जाते हैं।
कुछ रिश्ते होते हैं ठंडी छांव से,
प्यार से अपना बना जाते हैं।
बड़ी नाजुक है यह रिश्तो की डोर,
बात-बात पर टूट जाती है।
प्रेम विश्वास और सम्मान ना हो तो,
रिश्तो की गरिमा छूट जाती है।
स्वार्थ से भरे हुए हैं सारे रिश्ते,
हर इंसान यहां पर उदास है।
रंग बदलते रिश्तों को देख कर,
टूट गई उम्मीद की आस है।
रिश्तो के बिना अधूरा है जीवन,
आओ हम प्यार से गले लगाते हैं।
एक दूसरे की गलतियों को माफ कर,
सबको दिल से अपनाते हैं।
सौ, भावना मोहन विधानी ✍️
अमरावती महाराष्ट्र।




