
कोई हम में रहता है तो कोई अहम में रहता है।
कोई मैं ही मैं में रहता कोई बस वहम में रहता है।।
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अपनेपन का अहसास ही ताकत की दवा देता है।
मत रहो सदा ही क्रोध में यह घृणा को हवा देता है।।
भटक जाता आदमी जब द्वेष ही कहन में रहता है।
कोई हम में रहता है तो कोई अहम में रहता है।।
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खाक हो जाता बदन पर रंजिश खत्म नहीं होती है।
शत्रुता में कोई भी नीति सफल यत्न नहीं होती है।।
आगे बढ़ता नहीं जो अभिमान बोझ जहन में रहता है।
कोई हम में रहता है तो कोई अहम में रहता है।।
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जो संबंध जोड़ता और निभाता वही सफल होता है।
जो स्पर्धा नहीं ईर्ष्या करता वह सफलता भी खोता है।।
दिल में घृणा आग तो मन मस्तिष्क भी दहन में रहता है।
कोई हम में रहता है तो कोई अहम में रहता है।।
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रचयिता।।एस के कपूर “श्री हंस”
बरेली।।
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