साहित्य

हरी-भरी धरती हो अपनी 

संगीता श्रीवास्तव

मृदुल मृत्तिका मे एक नन्हा बीज रहा मुस्काता.

मुट्ठी भर परवाह संग, डाला प्यार जरा सा।

 

धरती-उर में बीज दबा, मिट्टी लिहाफ उढाया।

लहराएगा बाँह उठाकर, सघन रहेगी छाया।।

 

पौध लगाएगा हर हाथ,पूर्ण तभी अभियान।

हर शुभ अवसर पर दें एक, पौधा जीवनदान।

 

स्मृतियाँ मुस्काएँगी धर कर नव. नव.रूप।

फल फूल पल्लवित होंगीं मीठी यादें खूब।।👌🏽

 

शुद्ध हवाएं छाँव मिलेंगी राही को विश्राम।

आश्रय स्थल पक्षियों का करिए यह शुभ काम।।

 

पौधा एक लगाइए, सब रोपे निज माँ के नाम।

छाया माँ की मृदु महसूस करेंगे सुबह. शाम।।

 

हरियाली चँहु ओर हो स्वस्थ रहें सब लोग।

सुबह शाम हम सैर करें लगे न तन को रोग।

 

औद्योगिक अपशिष्ट रसायन, सभी विषैले गैस।

आते हैं ईंधन के काम अपने वन्य प्रदेश।

 

तरुवर होते पर उपकारी औषधि, मेह-प्रदाता।

प्राणवायु देते सबको हैं आरोग्य विधाता।

 

गोरैया घर लौट आएगी चहक भरेगी उड़ान,

धरा गगन की अपनी. अपनी परिपाटी है मान.

 

ऋतु-चक्रण वर्षा नियमित हो नदियाँ गाएं गान।

भूमि-स्खलन रुक जाएगा संरक्षित जल दान।

 

जैविक कचरा स्वयं अपघटित, प्लास्टिक ज़हर समान।

वर्जित पोलीथीन करें खुशियाँ पाएं जहान।

 

संगीता श्रीवास्तव शिवपुरी

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!