
न गम सिसकता हैं यहाँ,
न खुशी हंँसती है।
सब थमा-थमा सा है,
ये कैसी बस्ती है?
मन सर्द हो जम गए हैं,
इन्हें कोई आंच पिघलाती नहीं।
आवाज चीखो-पुकार की
अब कानों में जाती ही नहीं।
आँसू पत्थर के बहने लगे,
हादसे ऐसे यहाँ होने लगे।
नजरें मत फेरो इनसे,
इन्हें रोकने की जुगत करो।
बेतरतीब बढ़ रहा,
यह झाड़ मेहंदी का।
तराश दू्ंँ कैसे इसे?
फुनगी पे कोंपल हंँसती है।
उन्होंने ज़रा मुस्करा क्या दिया,
तुम दुखड़़े सुना बैठे।
बदले हुए तेवर देखने की,
तुम्हें फुर्सत ही नहीं।
बार-बार फेंक खिलौना,
नन्हा खिल-खिल हँस रहा।
उठा के न दूंँ तो रोने लगेगा,
थकने का मेरे उसे इल्म कहाँ।
छत पर आ बैठे हैं बादल,
मज़लिस हो रही है।
मैं भी हो जाऊँ शामिल
ख़्वाहिश ये हो रही है।
पास जाते ही मेरे,
जगह वे बदल बैठे।
कब तक भागूँगा मैं,
यूँ मुँडेरे फाँदता हुआ?
वीणा गुप्त
नई दिल्ली




