
फर्स्ट एडिटर
धधकी थीं आग की लपटें, सपनों का घर जल गया,
पल भर में कितने आँगन का चाँद उतर कर ढल गया।
कंधों पर पुस्तक थी जिनके, आँखों में थे स्वर्ण विहान,
ज्ञान-दीप लेने निकले थे, लौटे बनकर मौन निदान।
माँ की आँखें पथरा बैठीं, पिता खड़े निःशब्द हुए,
कल तक जिनके स्वर गूँजते थे, वे घर आज नि:शब्द हुए।
हे नन्हे स्वप्नों के राही, तुमको शत-शत नमन हमारा,
अश्रु-अर्घ्य अर्पित करता है आज व्यथित भारत सारा।
पर केवल श्रद्धांजलि देकर कब तक मन को बहलाएँ?
इन मासूमों की चिताओं पर कब तक आँसू बरसाएँ?
जब-जब नियमों की हत्या हो, जब लोभ विवेक निगल जाए,
जब सुरक्षा के नामों पर केवल कागज़ चल पाए—
तब ऐसी ही ज्वाला उठती, तब ऐसे ही प्राण झुलसते,
कुछ अधिकारी बच जाते हैं, सपनों के संसार उजड़ते।
उत्तर दो, ऐ सत्ता वालों! उत्तर दो, ऐ जिम्मेदार!
किसकी नींदों की कीमत पर होता है यह कारोबार?
इन बच्चों की मौन चिताएँ प्रश्न लिए खड़ी हुई हैं—
क्या जीवन से बढ़कर भी कुछ स्वार्थों की घड़ी हुई है?
ईश्वर दे दिवंगत आत्माओं को अपने चरणों में स्थान,
और दोषी हर हाथ मिले अब कठोरतम न्यायिक दंड-विधान।
आज यही संकल्प देश का, फिर ऐसा दिन न आएगा,
हर शिक्षा-मंदिर सुरक्षा का प्रथम धर्म अपनाएगा।
विनम्र श्रद्धांजलि। 🕯️🌹
*क्रोध भी है, शोक भी है — और न्याय की प्रतीक्षा भी।*




