साहित्य

तुम हो इन आंखों में 

डॉ रामशंकर

सत्तर साल की

उम्र क्या यह कितना

मासूमियत है

किसी बच्चें की तरह

सहज सरल मुस्कान और

आंखों की चमक

जानता हूं यह

मे नही तुम हो

इस चेहरे की

प्रसन्नता में

मुस्कान में

आंखों में दस्तक देती

मेरी क्या मिसाल है

नाचीज़ फकीर

दर्द का बेहिसाब

खजाना समेटे हुए

हर एक दर्द ऐसा

जो एक ही किसी की भी

जिंदगी तोड़ने की क्षमता

रखता हो

वहां यह आदमी

लगा है सदा ही प्रसन्न रहते हुए

कुछ नहीं होते हुए भी

बेहिसाब रोज़ रोज़

उपलब्धियों को समेटे

हजारों हजारों द्वारा सुन कर

पढ़ा जाने वाला

आदिवासी पिछड़े अंचल झाबुआ को अमर करने वाला

साहित्य जगत का

अद्भुत मसीहा

जैसे सैकड़ों सुकून देते

शब्दों से नवाजा गया

सब कुछ तुम हो

प्रणाम सत् सत् प्रणाम

ईश्वरीय शक्ति रूह

सत् सत् सत् वंदन

बस इसी तरह साथ बना रहे

 

डॉ रामशंकर चंचल

झाबुआ मध्य प्रदेश

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