
संसार का सबसे छोटा
और शक्तिशाली शब्द “माँ,”
कैसे तुम पर कुछ लिखूं, माँ
तुमने तो मेरी जिंदगी लिखी।
कोख दी, जिन्दगी दी
और सिखाया जीना माँ,
जीवन का पाठ सिखाने वाली
बनी मैं तेरी परछाई माँ।
कभी बनी मेरी सहेली
कभी बनी शिक्षिका,
सिखाती हर कार्यजो
भविष्य में हमने करने थे।
पावन मंत्र सिखाये
ईश्वर को कभी भूलो नहीं,
जिंदगी कभी गुलाब, कांटे
मीठा बोल छोड़ो नहीं।
माँ, ईश्वर का अनमोल उपहार
जिसने ममत्व का सागर दिया
निस्वार्थ भाव से सेवा करती
जिसका आंचल पकड़ चली, मैं।
मेरे लिये तुम माँ,हो नीला नभ
वेद पुराण गीता सार तुम
अविरल बहती गंगा मन्दाकिनी
तुम ही मेरी गोदावरी हो माँ।
माँ नर्मदे में कंकर कंकर शिव
उसी तरह कोख में रखा तुमने
शिव तो ना बना सकी मैं
पर गरल मैंने खूब पिया, माँ।
माँ तुम ही मेरी पूजा भक्ति
तुम ही हो मेरी आराधना,
रहती सदा तुम मेरे संग
महसूस मुझे होता हर पल।
थी तुम परिवार का कल्प वृक्ष
आज है सब डालियां हरीभरी
सब भाई बहन है सुखी माँ
देख, हर्षित, होती मेरे मन की गली।
स्वरचित
डॉ. प्रभा जैन “श्री ”
देहरादून



