साहित्य

मन में माया का है डेरा

डॉ ऋतु

मन में माया का है डेरा, क्यों तेरे इंसान।

पाकर सांसारिक कुछ निधियाँ, समझे हूँ भगवान।।

बिन तेरे भी सदा रहेगा, जीवन का संचार-

जानबूझकर क्यों बनता है, इस सच से अंजान।।१।

 

मन में माया का है डेरा, छिपा हृदय शैतान।

चार पोथियाँ पढ़कर समझे, खुद को मह विद्वान।।

मानवता का ढोंग रचाए, बनता सुधी महंत-

कलुष कृत्य निष्पादित करता, श्वेत पहन परिधान।।

 

स्वरचित

डॉ ऋतु  अग्रवाल

मेरठ, उत्तर प्रदेश

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