साहित्य

अपना गाँव-अपना बचपन 

डॉ कर्नल आदिशंकर

एक मील लम्बा बसा गाँव मेरा,

नाव सथनी बाला खेड़ा,

कई एक नाई काका, कई एक

बढ़ई काका, माली काका,

और कई एक लुहार काका,

कुम्हार और हलवाई काका,

कच्चे पक्के घर थे, लम्बा गलियारा,

हर मनई बहुतै दिलदार था,

एक मील लम्बा बसा गाँव मेरा …..।

 

कही भी किसी के घर खा लेते,

हर घर में भोजऩ तैयार था,

खेतों की सब्जी, लोबिया की

छियाँ खूब मजे से खाते थे,

जिसके आगे शाही पनीर और

गाजर का हलुआ भी बेकार था,

एक मील लम्बा बसा गाँव मेरा……।

 

दो मिऩट की मैगी नही ही होती

थी, पर दुधबड़ियाँ तैयार थे,

आम, जामुन, नीम की छांव और

पीपल, बरगद सदा बहार थे …

अपने गाँव के देशी आम, अमरूद,

खीरा, ककड़ी, भुट्टों का भरमार था,

कजरीतीज का दंगल और फागुन

की होली रंगों का त्योहार था,

एक मील लम्बा बसा गाँव मेरा……।

 

मुल्तानी माटी,रीठा से तालाबों

कुओं में जा जा कर नहाते थे ,

न साबुन, न सैंपू, न महकुआ

तेल, हमरे ख़ातिर सब बेकार थे,

कबड्डी व गिट्टी फोड़ खेलते थे,

हमे नहीं क्रिकेट का खुमार था,

एक मील लम्बा बसा गाँव मेरा …..।

 

कहानी दादी नानी की सुनते,

रेडीओ, टी वी न अखबार था,

संग साथियों के घूम घूम कर

खुश थे, चाचा ताऊ का प्यार था,

गाय, भैंस अपनी थी, बैल गाड़ी

और टेढ़ा, बीघापुर का बाज़ार था,

बुलट थी न बाइक थी और नही

कार थी, घोड़े पर एक्का सवार था,

एक मील लम्बा बसा गाँव मेरा…..।

 

कूटीबाबा, ठाकुरद्वारा, हाँसूपुर,

अंबिका देवी, चंदिकन धाम,

महावीरन में बड़े मंगल के मेला,

सावन शिवजी का शृंगार था,

गाँव के प्राइमरी व मिडिल स्कूल

में कई गावों के पढ़ने वाले बच्चे,

हुबलाल कालेज में प्रिन्सिपल श्री

हरिश्चंद्र भार्गव की ग्रामर की कक्षा,

एक मील लम्बा सा गाँव मेरा….।

 

आज इस अनजान से शहर में वो

प्यार वो इज़्ज़त कहाँ से लाऊं,

यही सोच सोच कर, हम गाँव

गेरावँ के देहाती बहुत दुख पाऊं,

वो बचपन का समय आदित्य

फिर आ जाय, तो बहुतै मजा पाऊँ,

फिर से असल जिन्दगी जी पाऊं,

उस माटी को सिर माथे लगाऊँ,

एक मील लम्बा बसा गाँव मेरा,

नाव सथनी बाला खेड़ा ।

एक मील लम्बा बसा गाँव मेरा,

नाव सथनी बाला खेड़ा।

 

डॉ कर्नल आदिशंकर मिश्र ‘आदित्य’, ‘विद्या वाचस्पति’ ‘विद्यासागर’, लखनऊ

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