
बदल रहे हैं रिश्ते आज, बहुत आया बदलाव ।
भूले कर्तव्य छोड़ स्नेह, भूले संस्कृति और लगाव।।
बदल गये खून के रिश्ते, परिवार की बदली परिभाषा ।
कौन सच्चा रिश्तेदार अपना, करें किससे मदद की आशा ।।
घट गये रिश्तों के कद, घटा रिश्तों का ठहराव ।
आज प्रेमी वही कल शत्रु, पड़ी दरारें बढ़ा अलगाव ।।
बदलते रिश्तों ने बढ़ाई, सत्य समाज में परेशानी ।
कौन दादा-दादी, भुआ, नहीं कोई नाना-नानी ।।
किसी का किसी से नाता, नहीं रहा अब नाता-रिश्ता ।
रिश्तेदार है धन-दौलत, होता वही सगा फरिश्ता ।।
ये अनाथालय वृद्धाश्रम ये, बदलते रिश्तों का परिणाम ।
महिला पुनर्वास निकेतन, हम भुगत रहे हैं ऐसे अंजाम ।।
रिश्तों को निजरूप निभाओ, समझकर अपना दायित्व ।
रिश्तों की दरारें मिट जाए, हम लिखें ऐसा साहित्य ।।
नरसिंगाराम जीनगर निजरूप
बाड़मेर, राजस्थान
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