साहित्य

बस जी रहे हैँ

पंकज एस पाण्डेय

घूम रहे हैँ सारी दुनिया क़े लोग, यहाँ अपने ग़मों को लेकर,

मिलने पर मगर हर कोई कहता है

बस मस्त हैँ जी आनंद है,

 

सुना कर अपनी कथा क्या करें ,

सामने वाले की व्यथा भी हमसे,

भरी पड़ी है।

यहाँ हर दिल कोई न कोई बोझ उठाए फिरता है।

 

जिंदगी ही कुछ ऐसी हो गई है

कि संघर्षों की तपती राहों पर,

सभी अंगारों पर चल रहे हैं ।

बचा ही नहीं कुछ कहने को,

 

—-बस जी रहे हैँ —

✍🏼पंकज एस पाण्डेय, शिकोहाबाद

स्वरचित, मौलिक ****

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