साहित्य

गीत

वर्तिका अग्रवाल

भजन हृदय के भाव पिरोए, प्यारे गाओ।

रथयात्रा का क्षण है आया,दर्शन पाओ।।

 

एक कथा मैं आज सुनाऊं,सुन लो प्यारे।

इंद्रद्युम्न को स्वप्न हुआ था, लकड़ी ला रे।।

सागर के तट काष्ठ मिलेगा,उसको लाना।

उससे ही प्रभु को बनवाना,यह सुख पाना।।

दर्शन प्यारा पाने भक्तों,सारे आओ।

रथयात्रा…

 

रूप बदलकर बूढ़ा बढ़ई,आया द्वारे।

देव विश्वकर्मा भगवन के, दर्शन सारे।।

बंद कक्ष में कार्य चला था,आकृति देते।

शोर हथौड़ी सुनकर के जग,धीरज लेते।।

पुहुप प्रीत के हृदय-कुंज के, भक्तों लाओ।

रथयात्रा…

 

एक दिवस सब शांत हुआ जब,रानी बोली।

राजा जी ! देखो तो अंदर,पग-पग तोली।।

बूढ़ा वो बढ़ई लगता था,प्राण दिया क्या।

कार्य अधूरा छोड़ भला या,भाग गया क्या।।

गुप्त बात का भान करो नृप!,अब तो जाओ।

रथयात्रा…

 

कक्ष खुला जो नहीं वहाँ था,मानव कोई।

जगत् नाथ ही मिले वहाँ पर,आँखें रोई।।

भाई-भगिनी साथ खड़े थें ,जग स्वीकारे।

दर्शन तब से वही मिले है,जग उर हारे।।

पावन दर्शन के अब सुंदर, गीत सुनाओ।

रथयात्रा..

 

वर्तिका अग्रवाल ‘वरदा’

वाराणसी

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