
नवभारत के नव प्रभात में ,कर्मयोगी बनकर छू ले नव आकाश ।
गुजरी हुई जिंदगी के दुखड़े भुला दे, छूना है नव आकाश ।
यादें कर अतीत की, समय न करें बर्बाद, आशा से छू ले नव आकाश।
छोड़े नकारात्मक सोच ,आशादीप से होगा नया प्रकाश ।
आए बधाएं, रचो नई विधाएं, रखो आत्मविश्वास।
हौसले से लेकर नई उड़ान , छूना है नव आकाश ।
कर्मठ बनो , आम आदमी से बन जाओगे खास ।
सतत प्रयास ही निराशा मिटाते, आ जाती है आशा पास ।
बंधक बेड़ियों को काट दो, कभी न होना हतास ।
प्रगति पथ पर बढ़ते रहो ,रुको नहीं, रखो होश -हवास ।
कुछ भी असंभव नहीं दुनिया में ,मंजिल पाने का सतत करो प्रयास।
पूरे होंगे दिल के अरमान, खुद चलकर मंजिल आएगी पास।
मानवीय मूल्यों को सदैव देना सम्मान, छूना है नव आकाश ।
यश कीर्ति ,सुख समृद्धि, शांति सब बन जाएंगे तुम्हारे दास।
सब मिलने पर अहंकार करना नहीं, करना प्रभु से अरदास ।
परमार्थ, राष्ट्र प्रेम करते रहना, भले मिले महलों में रहवास।
इंसान हो मानवता धर्म निभाना, नहीं चुभे माया -मोह की फांस।
शुभ श्रेष्ठ कर्म करने से मिले मौक्ष, क्यों लेना सन्यास ।
गीता संदेश -काम करो फल की चिंता नहीं करना ,मिट जाएंगे सारे संत्रास।
राष्ट्र हित में छूना है आकाश ,कर दो देश के शत्रु का सत्यानाश।
ज्ञान ,शिक्षा ,चिकित्सा ,कला, विज्ञान, अनुसंधान में भारत ने छू लिया नव आकाश।
नवभारत के नव प्रभात में कर्मयोगी बनकर, छूना है नव आकाश ।
रचयिता
डॉ शशिकला अवस्थी इंदौर मध्य प्रदेश
रचना स्वरचित मौलिक है ।




