
माँ तुम कितनी प्यारी हो, कितनी सुंदर हो,
छोटे-छोटे टुकड़ों में, आम अपने लल्ला को खिलाती हो।
वो आम अमृत सा लगता है,
लगता है यह फल स्वर्गलोक से आया है।
माँ के हाथों से आम खाकर, यह मन तृप्त हो जाता है,
मुझे खाता देख सलोनी माँ, तेरा हर रूप मुसकाता है।
यह आम जितना मीठा है माँ, तू वैसी ही मिठास सिखाती है,
जो बचे आम बस एक कभी, तो आपस में बाँटकर खाना सिखाती है।
त्याग, समर्पण और प्रेम के संग, माँ तू हमें जीना सिखाती है।
कवयित्री ज्योति बरनवाल, नवादा (बिहार)




