भगवान राजेश्वर राज सिद्ध पीठ के पूज्य पीठाधीश्वर परम पूज्य श्री श्री 108 पवहारी जी महाराज : भक्ति, सेवा और सनातन परंपरा के प्रकाश स्तंभ
डाॅ.शिवेश्वर दत्त पाण्डेय

उत्तर प्रदेश के देवरिया जनपद के पैकौली स्थित भगवान राजेश्वर राज सिद्ध पीठ पूर्वांचल की वैष्णव संत परंपरा का एक अद्वितीय आध्यात्मिक केंद्र है। लगभग दो शताब्दियों से यह सिद्धपीठ श्रद्धा, साधना, तप, त्याग और लोकसेवा का दिव्य आलोक फैलाता आ रहा है। यहाँ की संत परंपरा केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं, बल्कि मानव सेवा, आध्यात्मिक जागरण और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण का प्रेरणास्रोत रही है। पूज्य पवहारी जी महाराज की परंपरा ने सनातन धर्म के उस आदर्श को जीवंत रखा है, जिसमें भक्ति और सेवा एक-दूसरे के पूरक माने जाते हैं।

इस सिद्धपीठ की स्थापना प्रथम पवहारी महात्मा लक्ष्मीनारायण दास जी महाराज द्वारा की गई मानी जाती है। यहाँ भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण की अष्टधातु प्रतिमाएँ विराजमान हैं, जहाँ प्रभु श्रीराम की आराधना ‘राजेश्वर’ अर्थात राजा के स्वरूप में की जाती है। यही विशिष्ट परंपरा इस धाम को अन्य वैष्णव तीर्थों से अलग पहचान प्रदान करती है।
पैकौली की पवहारी कुटी लगभग दो शताब्दियों से अधिक समय से श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का केंद्र रही है। इस सिद्धपीठ की स्थापना प्रथम पवहारी महात्मा लक्ष्मीनारायण दास जी महाराज द्वारा की गई मानी जाती है। यहाँ भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण की अष्टधातु प्रतिमाएँ विराजमान हैं तथा भगवान श्रीराम की आराधना “राजेश्वर” अर्थात राजा के रूप में की जाती है। यही विशिष्ट परंपरा इस पीठ को अन्य वैष्णव धामों से अलग पहचान प्रदान करती है। यहाँ का प्रत्येक अनुष्ठान भक्त और भगवान के मधुर संबंध का सजीव अनुभव कराता है।

पवहारी जी महाराज की परंपरा का मूल संदेश है—भक्ति, तप, सेवा और समर्पण। इस पीठ से जुड़ी संत जमात वर्ष भर विभिन्न क्षेत्रों में भ्रमण कर धर्मप्रचार, सत्संग, रामनाम संकीर्तन, भजन-कीर्तन तथा लोककल्याण का संदेश देती है। रामनवमी, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, कार्तिक पूर्णिमा और माघ पूर्णिमा जैसे पावन अवसरों पर यहाँ विशाल धार्मिक आयोजन एवं मेले आयोजित होते हैं, जिनमें उत्तर प्रदेश, बिहार सहित देश के विभिन्न प्रांतों से हजारों श्रद्धालु आकर आध्यात्मिक आनंद की अनुभूति करते हैं।
इस सिद्धपीठ की सबसे अमूल्य आध्यात्मिक धरोहरों में से एक प्रथम पवहारी महाराज द्वारा अपने करकमलों से लिखित श्रीरामचरितमानस की हस्तलिखित प्रतियाँ हैं। परंपरा के अनुसार, उन्होंने अपने हस्तलेख में रामचरितमानस की दो प्रतियाँ तैयार की थीं। इनमें से एक पवित्र प्रति आज भी माधव भवन, पैकौली स्थित मंदिर में अत्यंत श्रद्धा और सम्मान के साथ सुरक्षित रखी गई है। यह प्रति स्वयं प्रथम पवहारी महाराज ने अपने करकमलों से पैकौली पवहारी पीठ के संस्थापक एवं परम श्रद्धेय स्वर्गीय बाबू समारु शाही जी तथा उनके अनुज स्वर्गीय बाबू लुटावन शाही जी को प्रदान की थी। वर्तमान में यह अमूल्य धरोहर उनके वंशज एवं प्रबंधक श्री सिद्धार्थ शाही के संरक्षण में सुरक्षित है। यह हस्तलिखित रामचरितमानस केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि गुरु-परंपरा, श्रद्धा, आध्यात्मिक उत्तराधिकार और सनातन संस्कृति की अमूल्य विरासत का दिव्य प्रतीक है। इसके दर्शन मात्र से श्रद्धालुओं के हृदय में भक्ति और श्रद्धा का संचार होता है।
पवहारी संत परंपरा ने समय-समय पर अनेक संत-महात्माओं के माध्यम से समाज को धर्म, सेवा और सदाचार की प्रेरणा दी है। वर्ष 2024 में इस गौरवशाली परंपरा के आठवें पीठाधीश्वर के रूप में पूज्य कौशलेंद्र दास जी महाराज का अभिषेक हुआ, जिससे यह दिव्य संत परंपरा निरंतर आगे बढ़ रही है। उनके नेतृत्व में यह पीठ आध्यात्मिक जागरण, धार्मिक संस्कार, गौसेवा, लोककल्याण और सनातन संस्कृति के संरक्षण के कार्यों को नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़ा रही है।
भगवान राजेश्वर राज सिद्ध पीठ केवल पूजा-अर्चना का केंद्र नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, वैष्णव परंपरा, लोकमंगल और आध्यात्मिक चेतना का जीवंत विश्वविद्यालय है। यहाँ आने वाला प्रत्येक श्रद्धालु भक्ति, शांति और आत्मिक ऊर्जा का अनुभव करता है। इस पावन धाम की वायु में रामनाम की मधुर अनुगूँज, संतों की तपस्या का तेज और सेवा की पवित्र भावना आज भी अनुभव की जा सकती है। ऐसा प्रतीत होता है मानो यहाँ का प्रत्येक कण भगवान श्रीराम की करुणा और कृपा से आलोकित है।
पवहारी जी महाराज की संत परंपरा आज भी समस्त मानव समाज को यह संदेश देती है कि सच्चा धर्म केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि मानव सेवा, सदाचार, दया, करुणा, विनम्रता और प्रभु श्रीराम के चरणों में पूर्ण समर्पण का नाम है। यही सनातन धर्म का शाश्वत स्वरूप है और यही इस सिद्धपीठ की आत्मा भी है।
निस्संदेह, पैकौली की यह पावन पीठ पूर्वांचल ही नहीं, सम्पूर्ण भारत की आध्यात्मिक धरोहर है, जहाँ से सनातन संस्कृति की दिव्य ज्योति अनादि काल से प्रज्वलित है और अनंत काल तक मानवता का पथ आलोकित करती रहेगी।
(लेखक दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह के संस्थापक एवं समूह सम्पादक हैं)




