
धरती से अंबर तक कोई राह आसान नहीं,
मगर तू जो चाहे तो हर हृदय में फूल खिला दे।
पहाड़ों को काटकर राह बना दे,
बिछड़े हुए दिलों को तू फिर से मिला दे।
तू जो चाहे तो..
सूरज की तपिश से सभी को बचा दे,
जलधारा को तू गंगा बना दे।
आसमान से बरसे मोती या अंगारे,
तू भीगे नैना में भी आश जगा दे।
तू जो चाहे तो…
अपनी लेखनी से समृद्ध समाज बना दे,
अंतर मन की पीड़ा को तू सुलझा दे।
मानव की देह में ही बसते हैं भगवान,
तू उनको स्वयं से ही मिला दे।
हे मनुष्य तू जो चाहे तो…
सूखे उपवन में फूल खिला दे,
धरती अंबर को एक बना दे।
हर घर-आँगन प्रेम से सिंचित कर,
स्नेह के भाव जगा दे।
ऋतु गर्ग,सिलीगुड़ी




