साहित्य

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक जयंती

डॉ. सुमन मेहरोत्रा

लोकमान्य तिलक, राष्ट्र-ज्योति, जन-मन के थे प्राण।

स्वाधीनता का मंत्र दिया, बढ़ा दिया सम्मान॥

 

“स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार” अमर उद्घोष,

जाग उठा भारत सकल, टूटा भय का कोष॥

 

लेखनी बनी वज्र-सी, अन्यायों पर वार,

‘केसरी’ की गर्जन से काँपा अत्याचार॥

 

गणपति उत्सव, शिवाजी का गौरव दिया जगाय,

जन-जन में राष्ट्रप्रेम की पावन ज्योति जलाय॥

 

कारागार की वेदना भी जिनको रोक न पाई,

कर्मपथ के उस तपस्वी ने विजय-पताका फहराई॥

 

ज्ञान, त्याग, संघर्ष का अनुपम था अभियान,

भारत माता के लिए अर्पित किया जीवन-दान॥

 

मुखमंडल पर तेज था, अद्भुत दिव्य प्रकाश,

श्वेत मूँछ, टोपी, चादर में झलके राष्ट्र-विलास॥

 

दृढ़ नयनों में जल रहा स्वाधीनता का मान,

लोकमान्य तिलक बने भारत की पहचान॥

 

ऐसे अमर पुरुष को शत-शत मेरा प्रणाम,

युग-युग तक गूँजे धरा पर उनका पावन नाम॥

 

तिलक-जयंती पर करें हम यह पावन संकल्प,

राष्ट्रधर्म हित कर्म करें, यही सच्चा विकल्प॥

 

स्वरचित

डॉ. सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’

मुजफ्फरपुर, बिहार

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