
बादल! केवल जल मत बरसा, जागे जन-जन का विश्वास।
सूखी धरती की आँखों में, फिर भर दे जीवन की प्यास।
खेतों की मुस्कान लौटे, नदियों में फिर गान बहे।
हर आँगन की प्यास बुझाकर, हरियाली का मान रहे।
पर इतना भी मत बरसना, घर-आँगन सब डूब जाएँ।
माँ की गोदी, बच्चों के सपने, आँसू बनकर बह जाएँ।
बरखा! तू वरदान तभी है, जब मर्यादा साथ रहे।
जीवन के हर सूने पथ पर, आशा का भी हाथ रहे।
ताल-तलैया, कूप बचेंगे, तब ही कल का जल बचे।
हर बूँदों का मान करेंगे, तब ही सुंदर पल बचे।
आओ ऐसा प्रण दोहराएँ, वर्षा का सम्मान करें।
जल-संरक्षण जीवन-मंत्र है, मिलकर इसका ध्यान करें।
मेघ गरजें तो चेत जगे, मानव अपना धर्म निभाए।
धरती माँ की हर बूँदों को, अमृत समझ हृदय अपनाए।
बारिश केवल ऋतु नहीं है, ईश्वर का अनुपम उपहार।
हर बूँदों में बसता है कल, यही प्रकृति का सच्चा सार॥
दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’
जनपद संभल उत्तर प्रदेश




