
त्रेता द्वापर से बनी हुई,मित्रों की रीत पुरानी।
देवो ने भी इसे निभाया,जिनकी है सुनी कहानी।।
राघव सुग्रीव कृष्ण सुदामा,और विभीषण के जैसी।
दूध नीर सम रही मित्रता,प्रकट करें हम भी वैसी।।
अमर मित्रता कर्ण सुयोधन,इसे चलो हम आजमाएँ।
मरते दम तक साथ न छोड़े,सच्चे हम मित्र कहाएँ।।
छल दम्भ-द्वेष का भाव न उपजे,सच्ची सब प्रीत निभाएँ।
सतयुग त्रेता द्वापर जैसे,मित्रों में नाम गिनाएँ।।
सम्मुख जो भी मीठा बोले,पीछे करता हो निंदा।
ऐसे मित्र तुरत तज दीजे,नहीं मरोगे तुम जिंदा।।
स्वार्थ भरे ऐसे मित्रों से,दूरी भी रखें बनाए।
आँखें नम यह सदैव करते, रहते हैं घात लगाए।।
निर्मल निर्झर शुचि भाव लिए,खींचे जो शुद्ध चित्र है।
बिना शर्त अपनाएंँ हमको, सच्चा बस वही मित्र है।।
सुख-दुख का साथी बनकर जो ,मैत्री का भाव निभाता।
सच्चा मित्र इत्र सम होता, जीवन को है महकाता।।
कलयुग में भी लोग गिने अब, कुछ मित्रों की हो जोड़ी।
नाम लिखे इतिहास हमारा ,गणना भले रहे थोड़ी।।
आओ मिल संकल्प करें हम,रीति पुरानी दुहराएंँ।
बने मित्र हम ऐसे जग में, सम्मुख सब शीश झुकाएँ।।
डॉ गीता पाण्डेय अपराजिता
रायबरेली उत्तर प्रदेश




