साहित्य

उजड़े सपनों का आख़िरी सहारा—बाबुल

दिनेश पाल सिंह

*भाग–3: आख़िरी निशानी: वो चाँदी की थाली, वो चाँदी का गिलास*

(मार्मिकता से भरपूर कहानी )

 

रात भर बेटी अपने पुराने कमरे में जागती रही।

दीवार पर टँगी बचपन की तस्वीरें, खिड़की से आती चाँदनी, अलमारी में रखी पुरानी किताबें… सब जैसे उससे बातें कर रहे थे।

सुबह हुई।

बरामदे में पिता चारपाई पर बैठे थे। बीमारी ने शरीर को कमजोर कर दिया था, लेकिन बेटी को सामने देखकर उनके चेहरे पर बरसों बाद सुकून उतर आया था।

उन्होंने धीमे से माँ से कहा—

“ज़रा… पुराना संदूक तो ले आना।”

माँ एक पल के लिए ठिठक गईं।

वह समझ गईं कि आज कौन-सा संदूक खुलने वाला है।

वर्षों से कमरे के कोने में रखा वह पुराना लकड़ी का संदूक…

जिसकी चाबी हमेशा पिता अपनी धोती की गाँठ में बाँधकर रखते थे।

संदूक सामने रखा गया।

पिता ने काँपते हाथों से गाँठ खोली।

ताला खुला…

ढक्कन धीरे-धीरे उठा।

ऊपर कुछ पुराने कपड़े रखे थे।

उनके नीचे एक लाल रंग का रेशमी कपड़ा बड़ी सावधानी से तह करके रखा था।

पिता ने उसे दोनों हाथों से उठाया।

कपड़ा खुलते ही भीतर से चाँदी की एक चमचमाती भोजन-थाली और एक छोटा-सा चाँदी का गिलास दिखाई दिया।

बेटी स्तब्ध रह गई।

उसके होंठ काँप उठे।

धीरे से बोली—

“बाबूजी… यह अभी तक…?”

पिता मुस्कुराए।

“हाँ बिटिया… तेरी विदाई के बाद किसी ने इन्हें हाथ नहीं लगाया।”

माँ ने भर्राए स्वर में कहा—

“हर दीपावली इन्हें माँजकर फिर इसी कपड़े में बाँध देती थी। तुम्हारे बाबूजी कहते थे— ‘इन्हें संभालकर रखना… जब मेरी बिटिया आएगी, तभी ये फिर निकलेंगे।'”

बेटी अब अपने आँसू रोक नहीं पा रही थी।

उसे याद आने लगा…

बचपन में जब वह इसी थाली में खाना खाती थी, तो पिता हँसकर कहते—

“मेरी बेटी रानी है… इसकी थाली भी रानी वाली होगी।”

वह कभी रूठ जाती तो पिता रोटी का छोटा-सा कौर बनाकर कहते—

“चलो… एक कौर बाबूजी के नाम का।”

और वह खिलखिलाकर हँस पड़ती।

आज वही थाली सामने थी…

लेकिन हँसी कहीं खो चुकी थी।

माँ ने उसी चाँदी की थाली में गरम-गरम रोटियाँ परोसीं।

थोड़ी-सी दाल…

थोड़ी-सी सब्ज़ी…

और पिता के कहने पर एक कटोरी खीर भी रख दी।

फिर चाँदी के उसी गिलास में पानी भरकर बेटी के सामने रख दिया गया।

पिता ने मुस्कुराकर कहा—

“आज इतने वर्षों बाद मेरी थाली अपने असली मालिक के सामने आई है।”

बेटी का हाथ काँप गया।

पहला कौर तोड़ते ही उसकी आँखों से आँसू टप-टप थाली में गिरने लगे।

वह सिसकते हुए बोली—

“बाबूजी… इतने प्रेम की मैं अधिकारी नहीं रही…”

पिता ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया।

उनकी आँखें भी भीग चुकी थीं।

उन्होंने धीमे स्वर में कहा—

“ऐसा मत कह, बेटी। बेटियाँ अधिकार लेकर नहीं आतीं… वे तो घर को यह अधिकार देकर जाती हैं कि उसे ‘बाबुल’ कहा जाए।”

यह सुनते ही बेटी फूट-फूटकर रो पड़ी।

पिता ने अपने काँपते हाथों से रोटी का एक छोटा-सा कौर बनाया।

जैसे बचपन में खिलाया करते थे…

वैसे ही आज भी उसके मुँह की ओर बढ़ाया।

बेटी ने कौर तो खा लिया…

पर उसके साथ बरसों का दर्द भी जैसे भीतर से बाहर आ गया।

कुछ देर बाद पिता की नज़र बेटी के चेहरे पर ठहर गई।

उन्होंने गहरी साँस ली और बहुत धीरे से पूछा—

“बेटी… चाँदी की इस थाली की चमक तो बरसों बाद भी लौट आई… लेकिन तेरे चेहरे की चमक किसने छीन ली?”

यह प्रश्न सुनते ही बेटी की पलकों ने जवाब दे दिया।

वह कुछ न बोली।

उसने केवल चाँदी का गिलास उठाया।

एक घूँट पानी पिया…

उसे लगा, जैसे उसमें पानी नहीं, बाबुल का अथाह स्नेह घुला हुआ है।

गिलास हाथ से काँपा…

और उसकी आँखों से गिरते आँसू उसी चाँदी की थाली में मोतियों की तरह बिखर गए।

पिता सब समझ गए…

लेकिन उस दिन उन्होंने कोई और प्रश्न नहीं किया।

क्योंकि उन्हें पता था—

कुछ दर्द शब्दों से नहीं खुलते… उन्हें खुलने के लिए केवल अपनेपन का इंतज़ार होता है।

आँगन में खड़ा नीम का पेड़ हवा के साथ धीरे-धीरे झूम रहा था।

मानो वह भी बरसों बाद बाबुल और बेटी के इस मिलन का मौन साक्षी बन गया हो।

लेकिन नियति अभी अपनी सबसे कठिन परीक्षा बाकी रखे बैठी थी…

 

*शेष अगले भाग में…*

 

दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’

जनपद संभल, उत्तर प्रदेश

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