साहित्य

ज़िन्दगी की एल्गोरिथ्म में, उलझे हैं

Rakesh Chandra

ज़िन्दगी की एल्गोरिथ्म में, उलझे हैं सब लोग।

सही है कोडिंग कौन सी, न समझे हैं लोग।।

 

ए.आई. के दौर में, चारों ओर है शोर।

ज्ञान बड़ा है बुद्धि से, इंटरनेट पर है जोर।।

 

अब मौलिक होना व्यर्थ है, यह जीवन का सार।

चैट जीपीटी का दामन थाम के, कर ले नैया पार।।

 

बुद्धिमत्ता नैसर्गिक है, कहते सारे लौग।

कृत्रिम भी हो सकती है, यह मात्र नहीं संयोग।।

 

डाटा सबसे महँगी वस्तु, सबमें पाने की है होड़।

बड़े-बड़े उद्योगपति, नित करते नये-नये गठजोड़।।

 

सुपर मानव बन जाएगा, पाकर ए.आई. का साथ।

मानवता छिप कर बैठी रहेगी, धरे हाथ पर हाथ।।

 

कृत्रिम प्रकाश में जीने की, सबकी इच्छा भारी ।

छायामृग को पाने की, हमने न की तैयारी ।।

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