साहित्य

हो समांत आस स्वर

डॉ. सुमन मेहरोत्रा

गुरु ज्ञान का दीपक जले, मिट जाए मन का अंधकार हो।

गुरु चरणों की वंदना करें, जीवन में फैले प्रकाश हो।

सद्बुद्धि सुधा बरसाएँ वे, हर लें हृदय की सब प्यास हो।

गुरु कृपा मिले जग में सदा, मंगलमय हर इक श्वास हो।

 

गुरु सूर्य समान प्रकाशित हों, देते जग को उजास हो।

उनकी वाणी अमृत बने, मन में मधुर विश्वास हो।

अज्ञान तिमिर को दूर करें, भर दें नव उल्लास हो।

गुरु पूर्णिमा के पावन दिन, चरणों में शीश निवास हो।

 

गुरु ज्ञान गंगा बहती रहे, पावन निर्मल आभास हो।

जीवन पथ पर साथ मिले, उनका सदा सुवास हो।

संस्कारों की सुंदर धरोहर, गुरु का अमूल्य उपहार हो।

उनके आशीषों से सजे, हर पल मधुर एहसास हो।

 

गुरु ही सच्चे मार्गदर्शक, देते जीवन को खास हो।

भटके मन को राह दिखाएँ, हरते सारे त्रास हो।

श्रद्धा से नमन करें उनको, जिनसे मिलता विश्वास हो।

गुरु चरणों की धूल बने, मन का पावन निवास हो।

 

गुरु वंदन का शुभ अवसर है, हृदयों में मधुर रास हो।

गुरु महिमा का गान करें हम, मुख पर सदा मिठास हो।

ज्ञान ज्योति से जगमग हो, हर मानव का विकास हो।

गुरु पूर्णिमा का पर्व रहे, जीवन में शुभ आभास हो।

 

 

स्वरचित

डॉ. सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’

मुजफ्फरपुर, बिहार

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