
अगर हर ख़्वाब मुकम्मल हो जाए,
तो फिर सफ़र का मज़ा कहाँ रह जाएगा?
हर मोड़ अगर मंज़िल बन जाए,
तो मुसाफ़िर किस नयी राह पर जाएगा?
कुछ अधूरी तमन्नाएँ ही तो,
दिल में उजाला करती हैं,
सूनी राहों में उम्मीदों की
चुपके से नयी आस जगती है।
हर सुबह इसलिए तो आती है,
कि कोई सपना अभी बाकी है,
हर धड़कन इसलिए धड़कती है,
कि मंज़िल की तलाश बाकी है।
जो मिल गया, वह कहानी बन गया,
जो न मिला, वही प्रेरणा बन गया।
थोड़ा अधूरापन ही जीवन का संगीत है,
इसी में संघर्ष और साहस की जीत है।
इसलिए ऐ ज़िंदगी!
सब कुछ अभी मत देना,
कुछ ख़्वाहिशें संभाल कर रखना,
ताकि हर नए सवेरे के साथ
जीने का एक नया बहाना मिलता रहे।
स्वरचित मौलिक अभिव्यक्ति
सुमन बिष्ट, नोएडा




