
गुरु जयकार त्रिलोक में , परम उच्च गुरु स्थान।
शुभम दिवस गुरु पूर्णिमा, गुरु पग दिखे जहान।।
दो अक्षर का ज्ञान भी ,मिले कहीं ज्यों भ्रात।
गुरु के सम ही पूज ले, पावन करले गात।।
बिन गुरु हम कुछ भी नहीं , नहीं मिले पहचान।
माटी- माटी ही रहे, ज्ञान बिना है भान।।
पारस सम गुरु हस्त है , पावन है पग धूल।
हाथ रखे ज्यों माथ पर, समझे जीवन मूल।।
ज्ञान बड़ा अनमोल है, मिले नहीं हर स्थान।
गुरुवर के ही छाँव में, पाते हैं श्रीमान ।।
शीश नवाकर गुरु चरण, अर्जित करते ज्ञान।
झुक कर ही मिलता सदा, विद्या उत्तम दान।।
कला- नृत्य विज्ञान का, गुरु ही है आधार।
शब्द -शब्द से सींच कर, शिष्य रहे हैं तार।।
प्रथम ज्ञान माँ से मिले ,जाने यह संसार।
गुरु माँ का हम पर रहा, अनगिन ही उपकार।।



