साहित्य

मन का सावन

संगीता वर्मा

नित नई उमंगों को लेकर, मन का सावन आया,

काले-काले बादलों ने, सारा अंबर है ढीला छाया।

रिमझिम- रिमझिम बूंदों ने जब, धरती पर है पाँव धरे,

सूखे बंजर खेतों में भी, नए अरमान यहाँ पनपे।

 

चली ठंडी पुरवा हवा, मन का हर कोना महक गया,

बीता जो गम का मौसम, वो सारा दर्द बह गया।

पेड़ों ने पहनी हरियाली, पंछी गाने लगे तराना,

दिल यह मेरा झूम उठा, पाकर सावन का बहाना।

 

बिजली चमकी आसमान में, डर सा थोड़ा सा लगता है,

तेरा चेहरा इस बारिश में, और ज्यादा प्यारा लगता है।

मन करता है कागज़ की, एक नाव बनाकर तैरा दें,

इस सावन की हर बूंद पर, अपना हर एक गम रख दें।

 

बुझ गई प्यास ज़मीन की, और मन भी तृप्त हुआ,

प्रकृति का यह रूप देखकर, जीवन संग संगीत हुआ।

आओ मिलकर ख़ुशी मनाएँ, सावन के मन के गीत गाते जाएँ,

प्यार भरी इन फुहारों में, दिल के दीप जलाते जाएँ।

 

✍️स्वरचित मौलिक रचना

संगीता वर्मा, कानपुर उत्तर प्रदेश

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