साहित्य

हथेली पर ठहरा सावन

नीलचित्रा व्यास 

मेहंदी रची हथेली पर,

मैंने एक नाज़ुक-सा फूल रखा था,

जैसे अपनी सारी अनकही इच्छाओं को

एक पल के लिए थाम लिया हो।

बारिश थम चुकी थी,

पर भीगी पगडंडियाँ अब भी

मेरे भीतर बरस रहे मौसम का

राज़ छुपाए बैठी थीं।

यह फूल कोई साधारण फूल नहीं,

मेरे मन का वह हिस्सा था,

जो हर बार टूटकर भी

प्रेम करना नहीं भूलता।

कितनी अजीब होती है प्रतीक्षा—

हथेली में फूल तो खिल जाता है,

पर जिसकी राह में उसे सँभालकर रखा हो,

वह अक्सर लौटकर नहीं आता।

सड़कें अपनी मंज़िलों में व्यस्त रहीं,

पेड़ अपनी हरियाली में मग्न रहे,

और मैं…

एक सफ़ेद बेंच पर बैठी

अपने ही मौन से बातें करती रही।

सोचा था,

वह आएगा तो यह फूल उसके नाम कर दूँगी,

पर समय ने सिखा दिया—

कुछ फूल अर्पित होने के लिए नहीं,

सिर्फ़ बिखर जाने के लिए खिलते हैं।

मेरी चूड़ियों की खनक भी

आज जैसे चुप हो गई है,

शायद विरह की आवाज़

हर संगीत से अधिक गहरी होती है।

फिर भी यह पीला फूल

मुझे जीना सिखा गया—

कि प्रेम का अर्थ

पाना नहीं, संजोकर भी मुस्कुरा देना है।

और जब मैं उठी,

तो फूल अब भी मेरी हथेली में था,

पर उसे थामे हुई लड़की

पहले जैसी नहीं रही…

क्योंकि कुछ सावन

पेड़ों को नहीं,

मनुष्य के भीतर खिला देते हैं।

नीलचित्रा व्यास

(चित्रलेखा व्यास)

कानोड़, उदयपुर (राजस्थान)

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