
हाँ कठपुतली हूँ मैं बन्दे,
डोर मेरी मालिक के हाथ।
मनोरंजन मैं करती सबका,
करके अपना अद्बुध नाच।
बच्चे बूढ़े हो या जवान,
सब देख मुझे मुस्काते हैं।
भूल जाते है सब दुःख अपना,
इस खेल का आनंद उठाते है।
कभी गिरती कभी उठती मैं,
जैसे मालिक मेरी खींचे डोर।
मेरा मुझमे कुछ नहीं,
मेरा अस्तित्व तो है मालिक की ओर।
ना इतरा स्वयं पर इतना तू बन्दे,
तुझमे मुझमे कोई भेद नहीं।
तू भी कठपुतली है उस परमपिता की,
क्या तुमको यह याद नहीं।
जीवन में अनेकों खेल खेलता,
कभी मुस्काता कभी रोता हैं।
होता ख़त्म तेरे जीवन का खेल,
जब मालिक तेरी डोर को खींचता हैं।
नंदिनी लहेजा
रायपुर(छत्तीसगढ़)




