साहित्य

दिसंबर की विदा बेला

डाॅ सुमन मेहरोत्रा

मुखड़ा—
दिसंबर की ये विदा–बेला,
ठंडी हवा का झोंका है।
साल पुराना धीरे–धीरे
कहता—अब रस्ता रोका है।
दिसंबर की ये विदा–बेला…

धूप धुँआसी कटोरियों में
दिन भर चुपचाप पिघलती है,
शाम उतरते ही यादों की
धुंध दिलों पर भी छलती है।
कदम–कदम पर ओस भिगोए,
जैसे कोई गीत संजोता है…
दिसंबर की ये विदा–बेला…

अधसूनी सी रातें बोलें—
“आ चल कुछ नयी तरंगें गाएँ”,
थकी पुरानी यादें देकर
नए सफ़र की राह सजाएँ।
वक़्त खड़ा है मोड़ पे लेकिन,
मन जाने क्यों यूँ रोता है…
दिसंबर की ये विदा–बेला…

सूखी पत्तियों को रुत ने
सड़कों पर यूँ बिखेरा है,
धुंध सकाल की उँगली लेकर
फिर नया रंग घेरा है।
मन कहता—इन पलों को थामें,
सब पल-बदला ही होता है…
दिसंबर की ये विदा–बेला…

डाॅ सुमन मेहरोत्रा
मुजफ्फरपुर, बिहार

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!