
बहुत सुन्दर है,देहरादून,
एक-एक,कण-कण में,
शिव-पार्वती है यहाँ,
देव नगरी है देहरादून।
पत्तों से छन-छन कर आती,
सुनहरी भोर की रश्मियां,
मन का आँगन खुशबू से महक- महक,
चहक-चहक कर जगमगा जाता।
पवन की शीतलता ,
हाथ बढ़ा कर रोक लेती, आने वाले,पथिक का जैसे,
मन से स्वागत कर रही हो।
शाम गोधूलि की बेला
हिल-हिल जाता मन का तार,
मानो संगीत में पिरो देती है
जीवन के सब अरमान।
पता है, रात को जब
जुगनू की बारात निकलती,
टिम-टिमाकर…टिम- टिमाकर…
छोटी-छोटी कालोनी मन अंतस की
जगमग हो जाती है।
दिव्य रौशनी दिखाती है, तारों की बारात,आकाश गंगा,
चाँदनी रात में खिल-खिला कर,
बांहे पसार,पास बुलाती है।
और हम छत पर खड़े-खड़े, गुमसुम हो जाते है,मन के मनके,
दिखते है जब प्रकृति के नजारे
खेल दिखाती है…नजर खुली-खुली,
खो जाते है प्रकृति की अठखेलियों में।
यूहीं……. यूहीं…..
रात निकल जाती है…..
स्वरचित
डॉ.प्रभा जैन “श्री ”
देहरादून




