साहित्य

क्यों होता है,क्या यही प्यार है

ऋतु गर्ग

छोड़ दी जाएंगी
बहुत सी ख्वाहिशें,
जिनके पंख तो है
पर उड़ान नहीं है।

हौसलों में जान तो है,
पर जिम्मेदारियां बहुत है।

घोसलों के परिंदे
अपने चूजों के लिए,
उड़ान भरते हैं,
संध्या होने पर नीड में आते हैं।

सुकून मिलता है
अपने ही बच्चों के साथ,
अपनी जिम्मेदारियां के साथ
उन एहसासों के साथ,
जहां आनंद है अपरिमित।

होता है एक अलग जहांन,
शोर नहीं..
है एक चिरस्थाई आनंद,
मन को हर्षित करता है।

उड़ान के लिए प्रेरित होकर,
उसे अपना ही घोसला
स्वर्ग सा प्रतीत होता है।

जहां मां का आंचल
सदैव निछावर होता है।
प्रेम से आह्लादित,
उन्माद का स्वर
हर ओर झलकता है।

हां यही प्यार है,
हां यही प्यार है।

ऋतु गर्ग, सिलीगुड़ी, पश्चिम बंगाल
स्वरचित मौलिक रचना

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