
हां ,मैंने उस वक्त
अभिमन्यु बनने का
निश्चय किया था।
जब चारों ओर
छद्म वेश में
मुझे छला जा रहा था।
चक्रव्यूह की रचना
जब हो रही थी,
उसी दिन से मैंने
अभिमन्यु बनने का संकल्प किया।
मुझे एहसास था
उन घटाओं का,
जो चारों ओर
मेरे ऊपर मंडरा रही थीं।
उस वक्त कृष्ण ने
मेरा हाथ अपने हाथों में लिया।
मुझे चक्रव्यूह से निकलने,
अपनी शक्तियों को
पहचानने का रास्ता दिखाया।
हां !जब कृष्ण साथ थे
तब मुझे आभास हुआ,
अपने ही अंतःकरण में
व्याप्त प्रकाश का।
हां वही रास्ता था
ज्ञानी बनने का,
वही रास्ता था
छद्म वेश धारी को पहचानने का।
अब अभिमन्यु
पराजित नहीं हुआ।
“वह निर्बाध गति से चलता हुआ_
अभेद्य चक्रव्यूह को पार कर गया।”
क्योंकि पराजय युद्ध में नहीं,
अज्ञान में थी।
अभिमन्यु बनकर वह
जीवन सार्थक कर गया।
ऋतु गर्ग सिलीगुड़ी पश्चिम बंगाल


