साहित्य

पागल बन के

कनक

पागल बन के

पागल बन के खिलता जाए
दिल से दिल मिलता जाए।।

जब जब आती यादों में वो
दिल हमारा मचलता जाए।।

दिल से दिल को जोड़ा जाए
दिल उसका मन छोड़ा जाए।।

लड़ती रहती हरदम जाने
उसका प्यार मिटाया जाए।।

दिल से मुझको रुसवा कर के
बाहों मे मुझे झुलाया जाए।।

कनक

ख्वाबों में सुलह

ख्वाबों में सुलह हो जाती हैं जिगर से देखा
इक ही हसरत है जमाने को उधर से देखा।।

चारों ही तरफ़ है दरिंदे किसे देखे अब हम
एक ही रंग हैं दुनिया को जिधर से देखा।।

खोज ना ख़बर है कुछ भी दिल पे लगी हैं
दर्द दरिया बन जाता है नज़र से देखा।।

प्यास बढ़ती है कनक जब तक कोई चारा
जिन्दगी को तुझ बिन यार सहर से देखा।।

घर से गुजरा जब वह भी चम चम दीवाना
उसको समझा कुछ लोगों ने डर से देखा।।

कनक

जिन्दगी में न ही रूका

जिन्दगी में न ही रूका वो उधर जाता है
जाने क्यूं वो भी निगाहों से उतर जाता है।।

हौसला हैं मुझमें यार चला हूं आगे
पर तिरा ग़म है कि बढ़ता है ठहर जाता है।।

मुश्किल है सफ़र भी मेरा फ़िर भी चलता हूं
बात आखिर कुछ भी तो न किधर जाता है।।

हौंसला हैं न शराफ़त उसमें भी देखो
जाने बेखबर हैं वह भी जो सुधर जाता है।।

वक़्त जाता भी निकल कर के सफ़र जाता है
देखते देखते ही साल गुजर जाता है।।

कनक

 

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